(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.54. अध्यायः 054
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
कृष्णेन भीष्मंप्रति युधिष्ठिरस्य तदनुपसर्पणकारणाभिधानम्॥ 1॥ भीष्मेण स्वाज्ञयोपसृत्याभिवादयन्तं युधिष्ठिरंप्रति धर्मप्रश्नानुज्ञानम्॥ 2॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 12-54-0x(5466)(66878)
अथाव्रवीन्महातेजा वाक्यं कौरवनन्दनः।
हन्त धर्मान्प्रवक्ष्यामि दृढे वाङ्भनसी मम॥ 12-54-1(66879)
तव प्रसादाद्गोविन्द भूतात्मा ह्यसि शाश्वतः।
युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा मां धर्माननुपृच्छतु।
एवं प्रीतो भविष्यामि धर्मान्वक्ष्यामि चाखिलान्॥ 12-54-2(66880)
यस्मिन्राजर्षभे जाते धर्मात्मनि महात्मनि।
अहृष्यन्नृषयः सर्वे स मां पृच्छतु पाण्डवः॥ 12-54-3(66881)
सर्वेषां दीप्तयशसां कुरूणां धर्मचारिणाम्।
यस्य नास्ति समः कश्चित्स मां पृच्छतु पाण्डवः॥ 12-54-4(66882)
धृतिर्दमो ब्रह्मचर्यं क्षमा धर्मश्च नित्यदा।
यस्मिन्नोजश्च तेजश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः॥ 12-54-5(66883)
संबन्धिनोऽतिथीन्भृत्यान्संश्रितांश्चैव यो भृशम्।
संमानयति सत्कृत्य स मां पृच्छतु पाण़्डवः॥ 12-54-6(66884)
सत्यं दानं तपः शौर्यं शान्तिर्दाक्ष्यमसंभ्रमः।
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि स मां पृच्छतु पाण्डवः॥ 12-54-7(66885)
यो न कामान्न संरम्भान्न भयान्नार्थकारणात्।
कुर्यादधर्मं धर्मात्मा स मां पृच्छतु पाण्डवः॥ 12-54-8(66886)
सत्यनित्यः क्षमानित्यो ज्ञाननित्योऽतिथिप्रियः।
यो ददाति सतां नित्यं स मां पृच्छतु पाण्डवः॥ 12-54-9(66887)
इज्याध्ययननित्यश्च धर्मे च निरतः सदा।
क्षान्तः श्रुतरहस्यश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः॥ 12-54-10(66888)
वासुदेव उवाच। 12-54-11x(5467)
लज्जया परयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः।
अभिशापभयाद्भीतो भवन्तं नोपसर्पति॥ 12-54-11(66889)
लोकस्य कदनं कृत्वा लोकनाथो विशांपते।
अभिशापभयाद्भीतो भवन्तं नोपसर्पति॥ 12-54-12(66890)
पूज्यान्मान्यांश्च भक्तांश्च गुरून्संबन्धिबान्धवान्।
अर्घार्हानिषुभिर्भित्त्वा भवन्तं नोपसर्पति॥ 12-54-13(66891)
भीष्म उवाच। 12-54-14x(5468)
ब्राह्मणानां यथा धर्मो दानमध्ययनं तपः।
क्षत्रियाणां तथा कृष्ण समरे देहपातनम्॥ 12-54-14(66892)
पितॄन्पितामहान्भ्रातॄन्गुरून्संबन्धिबान्धवान्।
मिथ्याप्रवृत्तान्यः सख्ये निहन्याद्धर्म एव सः॥ 12-54-15(66893)
समयत्यागिनो लुब्धान्गुरूनपि च केशव।
निहन्ति समरे पापान्क्षत्रियो यः स धर्मवित्॥ 12-54-16(66894)
यो लोभान्न समीक्षेत धर्मसेतुं सनातनम्।
निहन्ति यस्तं समरे क्षत्रियो वै स धर्मवित्॥ 12-54-17(66895)
लोहितोदां केशतृणां गजशैलां ध्वजद्रुमाम्।
महीं करोति युद्धेषु क्षत्रियो यः स धर्मवित्॥ 12-54-18(66896)
आहूतेन रणे नित्यं योद्धव्यं क्षत्रबन्धुना।
धर्म्यं स्वर्ग्यं च लोक्यं च युद्धं हि मनुरब्रवीत्॥ 12-54-19(66897)
वैशम्पायन उवाच। 12-54-20x(5469)
एवमुक्तस्तु भीष्मेण धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः।
विनीतवदुपागम्य तस्थै संदर्शनेऽग्रतः॥ 12-54-20(66898)
अथास्य पादौ जग्राह भीष्मश्चापि ननन्द तम्।
मूर्ध्निं चैनमुपाघ्राय निषीदेत्यब्रवीत्तदा॥ 12-54-21(66899)
तमुवाचाथ गाङ्गेयो वृषभः सर्वधन्विनाम्।
मां पृच्छ तात विस्रब्धं मा भैस्त्वं कुरुसत्तम॥ ॥ 12-54-22(66900)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि चतुःपञ्चाशोऽध्यायः॥ 54॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-54-2 भूतात्मा प्राणिनामन्तरात्मासि। तेन ममाभिप्रायं वेत्सीति भावः॥ 12-54-11 अभिशापो लोकगर्ह्यता॥


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